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Ek Chuha Mara Hua

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हिन्दी कहानी के क्षेत्र में प्रिंसिपल अश्विनी आहूजा की रचनात्मकता साहित्य जगत के लिए एक ऐसा आश्वासन है जो उनके प्रथम कहानी संग्रह “एक चूहा मरा हुआ” के 1991 में प्रकाशित प्रथम संस्करण से मिल गया था। अब 34 साल बाद इस पुस्तक का द्वितीय संस्करण प्रकाशित होने जा रहा है। महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों की गुरुकृपा का ‘प्रसाद’ भक्तों को गिराकर कितना ऊंचा उठा देता है, कहानीकार अश्विनी आहूजा ने इस संग्रह में ऐसे विद्या मंदिरों के नकली देवत्व और काम अध्यात्म की कलई सफलता से खोली है। “एक चूहा मरा हुआ” का जब प्रथम संस्करण प्रकाशित हुआ था तब संग्रह की कहानियों की भाषा के खुलेपन, काम कुंठा के सटीक चित्रण व गाली गलौच के कारण इस पर काफी चर्चा हुई थी। तब दिल्ली विश्वविद्यालय में कार्यरत हिन्दी के प्रोफेसर डॉ. सारस्वत मोहन मनीषी ने लिखा था अश्विनी आहूजा की कहानियों का अगर ईमानदारी से विश्लेष्ण किया जाए तो इन कहानियों में समाज की विसंगतियों से छूटने, गली सड़ी मानसिकता के गलितांश को काट फैंकने व दुर्गन्धित वातावरण को संवारने की एक उत्कट लालसा है। अब पुस्तक के द्वितीय संस्करण में लेखक ने कहानियों की भाषा में अपेक्षित सुधार किया है। 34 वर्षों तक अंग्रेजी व हिन्दी में कहानी लेखन के बाद लेखक को अनुभव हो गया है कि उसे समाज की बुराईयों पर अंकुश लगाने व दुर्गन्धित वातावरण को सुधारने के लिए गाली गलौज व भाषा के खुलेपन की जरूरत नहीं है। वह विसंगतियों से छूटने, गली सड़ी मानसिकता के गलितांश को काट फैंकने का काम भाषा की गरिमा बनाए रखकर करने में पूर्णतः सक्षम है।

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