”क्या ‘शून्य’ सच में खाली होता है, या इसमें पूरी कायनात बसी है?”
यह किताब उस मुकाम की दास्तान है जहाँ पहुँचकर शब्द हार जाते हैं, यादें बोझ बन जाती हैं और इंसान खुद को एक गहरे खालीपन में पाता है। ‘शून्य से संवाद’ सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि उस ‘शून्य’ की तलाश है जहाँ पहुँचकर इंसान पहली बार खुद से रूबरू होता है।
यह पुस्तक प्रेम और विरह की परतों को चीरते हुए उस एकांत की बात करती है, जिसे हम अक्सर अकेलेपन के डर में खो देते हैं। यह सफर हमें सिखाता है कि जिसे हम ‘अंत’ समझते हैं, वह अक्सर एक नई और गहरी शुरुआत का प्रवेश द्वार होता है।
”क्योंकि जब लफ़्ज़ खत्म हो जाते हैं, तब रूह का संवाद शुरू होता है।”
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